
तेरी बुराइयों को हर अख़बार कहता है,
और तू मेरे गांव को गँवार कहता है
और तू मेरे गांव को गँवार कहता है
ऐ शहर मुझे तेरी औक़ात पता है
तू बच्ची को भी हुस्न - ए - बहार कहता है
तू बच्ची को भी हुस्न - ए - बहार कहता है
थक गया है हर शख़्स काम करते करते
तू इसे अमीर का बाज़ार कहता है।
तू इसे अमीर का बाज़ार कहता है।
गांव चलो वक्त ही वक्त है सबके पास
तेरी सारी फ़ुर्सत तेरा इतवार कहता है
तेरी सारी फ़ुर्सत तेरा इतवार कहता है
मौन होकर फोन पर रिश्ते निभाए जा रहे हैं
तू इस मशीनी दौर को परिवार कहता है
तू इस मशीनी दौर को परिवार कहता है
जिनकी सेवा में खपा देते थे जीवन सारा,
तू उन माँ बाप को अब भार कहता है
तू उन माँ बाप को अब भार कहता है
वो मिलने आते थे तो कलेजा साथ लाते थे,
तू दस्तूर निभाने को रिश्तेदार कहता है
तू दस्तूर निभाने को रिश्तेदार कहता है
बड़े-बड़े मसले हल करती थी पंचायतें
तु अंधी भ्रष्ट दलीलों को दरबार कहता है
तु अंधी भ्रष्ट दलीलों को दरबार कहता है
बैठ जाते थे अपने पराये सब बैलगाडी में
पूरा परिवार भी न बैठ पाये उसे तू कार कहता है
पूरा परिवार भी न बैठ पाये उसे तू कार कहता है
अब बच्चे भी बड़ों का अदब भूल बैठे हैं
तू इस नये दौर को संस्कार कहता है ।।
तू इस नये दौर को संस्कार कहता है ।।
गणेश पांडेय
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Poem/Artical

गणेश पांडे जी किसी दूसरे शायर की रचना अपने नाम से लगाना उचित नहीं है। यह कॉपी राइट्स नियम का उलंघन है आपको शायर का नाम देना चाहिए और अगर शायर का नाम नहीं मालूम तो अज्ञात लिखना चाहिए था
ये रचना गुजरात के कवि हरेन्द्र सिंह कुशवाह एहसास जी की है
Ap ye kaise kah sakte hain k ye rachna kisi aur ki hai. kya apke pas is bat ka koi Praman hai ? pls revert 9795745555