कवरेज इण्डिया विशेष: कर्मों के अनुसार फल देते हैं शनिदेव




कवरेज इण्डिया धर्म कर्म: शनिदेव कर्म प्रधान देवता हैं और वह मनुष्य के कर्मों के अनुसार फल देते हैं। इसीलिए शनिवार का दिन शनिदेव की पूजा के लिए खास माना जाता है। शनिदेव के अशुभ प्रभाव को कम करने व उनका आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए विभिन्न प्रकार के पूजन किए जाते हैं। देखा जाता है कि शनिदेव की कृपा पाने के लिए लोग हर शनिवार शनिदेव पर तेल चढ़ाते हैं। अधिकांश लोग इस कर्म को शनि की कृपा प्राप्त करने की प्राचीन परंपरा मानते हैं। लेकिन पौराणिक कथा के अनुसार शनिदेव को तेल से दर्द में राहत मिलती है और तेल चढ़ाने वाला उनका कृपापात्र हो जाता है।

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार जब हनुमान जी पर जब शनि की दशा प्रांरभ हुई उस समय समुद्र पर रामसेतु बांधने का कार्य चल रहा था। राक्षस पुल को हानि पहुंचा सकते हैं, यह आशंका सदैव बनी हुई थी। इसलिए पुल की सुरक्षा का दायित्व हनुमान जी को सौपा गया था। लेकिन रामकाज में लगे हनुमान पर शनि की दशा आरम्भ होनी थी।
हनुमान जी के बल और कीर्ति को जानते हुए शनिदेव ने उनके पास पहुंच कर शरीर पर ग्रह चाल की व्यवस्था के नियम को बताते हुए अपना आशय बताया। जिस पर हनुमान जी ने कहा कि वे प्रकृति के नियम का उल्लघंन नहीं करना चाहते लेकिन राम-सेवा उनके लिए सर्वोपरि हैं।

शनिदेव ने हनुमान से मांगी अपने किए की क्षमा

उनका आशय था कि राम-काज होने के बाद ही शनिदेव को अपना पूरा शरीर समर्पित कर देंगे परंतु शनिदेव ने हनुमान जी का आग्रह नहीं माना। और वे अरूप होकर जैसे ही हनुमान जी के शरीर पर आरूढ़ हुए, उसी समय हनुमान जी ने विशाल पर्वतों से टकराना शुरू कर दिया। शनिदेव शरीर पर जिस अंग पर आरूढ़ होते, महाबली हनुमान उसे ही कठोर पर्वत शिलाओं से टकराते। फलस्वरूप शनिदेव बुरी तरह घायल हो गए। उनके शरीर पर एक-एक अंग आहत हो गया। शनिदेव जी ने हनुमान जी से अपने किए की क्षमा मांगी।
हनुमान जी ने शनिदेव से वचन लिया कि वे उनके भक्तों को कभी कष्ट नहीं पहुंचाएंगे। आश्वस्त होने के बाद रामभक्त अंजनीपुत्र ने कृपा करते हुए शनिदेव को तिल का तेल दिया, जिसे लगाते ही उनकी पीड़ा शांत हो गई। तब से शनिदेव को प्रसन्न करने के लिए उन पर तिल का तेल चढ़ाया जाता है।

छाया के गर्भ से हुआ शनि देव का जन्म

धर्मग्रंथों के अनुसार सूर्य की पत्नी संज्ञा की छाया के गर्भ से शनि देव का जन्म हुआ, जब शनि देव छाया के गर्भ में थे तब छाया भगवान शंकर की भक्ति में इतनी ध्यान मग्न थी की उसने अपने खाने पीने तक की सुध नहीं थी जिसका प्रभाव उसके पुत्र पर पड़ा और उसका वर्ण श्याम हो गया। शनि के श्यामवर्ण को देखकर सूर्य ने अपनी पत्नी छाया पर आरोप लगाया की शनि मेरा पुत्र नहीं हैं। तभी से शनि अपने पिता से शत्रु भाव रखते थे।

शनि देव ने अपनी साधना तपस्या द्वारा शिवजी को प्रसन्न कर अपने पिता सूर्य की भांति शक्ति प्राप्त की और शिवजी ने शनि देव को वरदान मांगने को कहा, तब शनि देव ने प्रार्थना की कि युगों युगों में मेरी माता छाया की पराजय होती रही हैं, मेरे पिता पिता सूर्य द्वारा अनेक बार अपमानित किया गया हैं ! अतः माता की इच्छा है कि मेरा पुत्र अपने पिता से  भी ज्यादा शक्तिशाली बने ! तब भगवान शंकर ने वरदान देते हुए कहा कि नवग्रहों में तुम्हारा सर्वश्रेष्ठ स्थान होगा ! मानव तो क्या देवता भी तुम्हारे नाम से भयभीत रहेंगे ।

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