रिपोर्टर-गोविन्द वर्मा
बाराबंकी।गुरूवार को अपराहन आरटीओ कार्यालय में भ्रष्टाचार को समाप्त करने के नाम पर पूर्व प्लान जो ड्रामा प्रशासन व पुलिस ने खेला उससे भ्रष्टाचारियों पर तो आंच नहीं आई लेकिन दूसरी तरफ मोहल्ले वासियों से लेकर आमजन तक के सामने जो दहशत प्रशासन ने फैलायी उसको लेकर लोगों में असमंजस जरूर है कि प्रशासन की कोशिश लोगों को डराकर अपना मुंह जारी सरकारी उत्पीड़न-भ्रष्टाचार को लेकर बंद रखने की है या फिर लोगों को सहूलियत देने की?
क्यूंकि वहां उस समय जो हुआ उसमें एक पान वाले समेत तीन दुकानदारों की अबतक की पाईपाई जोड़कर तैयार की छोटी मोटी दुकान को लाखों रूपए पगार में पाने वाले और घूस में करोड़ो डकारने वाले मारपीट बेईज्जती बकायदा करके उठा ले गए साथ में कुछ सज्जन अपने आप काम करवाने की उमंग में आए लोगों को जिनमें एक पति-पत्नी भी शामिल थीं। जिनको शायद इस हिटलर टाइप प्रशासन की धमक ता जिन्दगी नहीं भूलेगी और थाने में अपमानजनक स्थिति में बिताए अपने चार-पांच बेकार के अविस्मरणीय घंटो को भी।
आरटीओ दफ्तर में हुई कार्यवाही में जो जानकारी अनुसार घूस के सबसे बड़े हिस्सेदार है उनसे पूछताछ भी नहीं हुई दूसरी तरफ रोजगार की तालाश में पान की दुकान, फोटो स्टेट, सेवा केंद्र सहित अन्य कापी किताब की दुकान चलाकर आने वाले लोगों की फार्म भरने मे मदद करने के नाम पर दस-बीस की कमाई की बदौलत दो जून की रोटी का जुगाड़ कर अपने परिवार वालों का पेट भर रहे लोगों को ही नहीं बल्कि अपने कार्य से दफ्तर के निकट पहुंचे लोगों को जबरन आतंकवादी भांति उठाकर जो प्रताड़ना देश की सबसे अव्वल संवर्ग आईएएस की होनहार ने एक अपराधी की भांति अंजाम दी उसकी भर्तस्ना जितनी की जाए उतनी कम है। क्यूंकि जब इस तथ्य की जांच की गई कि घूस कौन लेता है और दलालों की काम क्या है तो जिस लाइसेंस को अन लाइन कराने में एक सुविधा केद्र चलाने वाले को जहां आधे घंण्टे की मेहनत में बीस रूपए बचते हैं वहीं आरटीओ कार्यालय में स्टाफ से लेकर आरआई तक एक हजार रूपए तक घूस लेते हैं। वहीं पकड़ी गई गाड़ियों से माल पल्टाई के नाम पर भी प्रति गाड़ी सीधे दो से ढ़ाई हजार आराम से वसूले जाते हैं जिसमें वो सीधे आए तो ठीक या दलाल द्वारा आए तो ठीक। दलाल का हिस्सा वही बीस या तीस मात्र। हद तो यह है कि इमानदारी की मिसाल की हिटलर साही के बीच भी जांच वाले दिन भी वहां के कर्मचारियों ने कार्यालय से चन्द कदम दूर रहकर ही हजारो बनाकर पैसे का लेनदेन कर गाड़ी छोड़ भी दी। जिसको प्रशासन पता कर सकता है रिकार्ड मुताबिक और संबंधित से पूछताछ कि कितने दिए आदि आदि।
लेकिन दूसरी तरफ जहां चायपानी वाले दो दुकानदारों के यहां मौत सा सन्नाटा एक बेअंदाज हिटलर टाइप अधिकारी की देन है तो दूसरी तरफ काम कराने आए दर्जन भर लोगों को भी बिना किसी अपराध केवल अंपनी काबलियत साबित करने के चक्कर में दण्ड देना भी पूरे जनपद में चर्चा का विषय बना हुआ। ये तो अलग विषय है लेकिन बंद बिना उठी दुकानों को बिना नोटिस बिना वाजिब कारण सील करना कौन से कानून की किताब मे लिखा है इसका भी जवाब शायद सीएम योगी से पीएम मोदी के पास भी नहीं होगा जिनकों दिखाने के नाम पर पूरा दहशतखेज ड्रामा डीएम ने गुरूवार को खेला। अब बंद दुकानो पर सील पर एक दुकान पत्रकार की भी बताई जा रही है जो दफ्तर आवासविकास में शिफ्ट होने के बाद से बंद थी। वहीं शुक्रवार को भी काम कराने आए लोगों को काम न हो पाने के कारण कईयों को निराश लौटना पड़ा, जिसका दर्द भी न डीएम को होगा न ही किसी अन्य कथित इमानदार को।
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