इलाहाबाद: प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया के पूर्व चेयरमैन जस्टिस मार्कण्डेय काटजू भी चाहते थे कि जिस तरह वकालत के पेशे में आने के लिये एलएलबी की डिग्री और बार काउंसिल में रजिस्ट्रेशन और डॉक्टर बनने के लिये एमबीबीएस डिग्री और मेडिकल काउंसिल में रजिस्ट्रेशन या टीचर बनने के लिये कुछ कोर्स/ डिग्री अनिवार्य है इसी तरह पत्रकारिता के प्रोफेशन में उतरने के लिये भी कुछ कानूनी योग्यता भी अनिवार्य होनी चाहिये।
इस बावत जस्टिस काटजू ने वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग के संयोजकत्व में एक तीन सदस्यीय समिति भी गठित कर दी थी जिसको जल्द से जल्द रिपोर्ट देने के कहा था इसके लिये क्या न्यूनतम योग्यतायें निर्धारित की जायें। समिति में प्रेस काउंसिल के सदस्य राजीव सबादे और पुणे विश्वविद्यालय में पत्रकारिता विभाग में एसोसेएट प्रोफेसर डॉ. उज्जवला बार्वे शामिल थे। बाद में इस समिति में प्रेस काउंसिल के सदस्य राजीव रंजन नाग एवं गुरिंदर सिंह तथा आईआईएमसी के महानिदेशक सुनीत टण्डन को भी शामिल किया गया था ।उस समय श्री गर्ग को यह शक्तियाँ भी दी गयी थीं कि वे जिन्हें जरूरी समझें समिति में शामिल कर सकते हैं।
इस प्रकार कहा जा सकता है कि डिग्री ले लेने से ही पत्रकारिता में उच्च मूल्य स्थापित हो पाएगी ? वैसे भी जनसंचार की पढ़ाई कराने वाले संस्थान बड़े शहरों में खुले हैं। ये संस्थान तकनीक भी सिखा रहे हैं, खबरों का उत्पादन और प्रस्तुतीकरण भी सिखा रहे हैं इसे कुछ इस तरह भी समझा जा सकता है। देश की तमाम निर्णायक संस्थाओं पर आईआईटी/ आईआईएम से निकले प्रोफेशनल्स का कब्जा है। सिविल सेवा में आने वाले अधिकारी उच्च स्तरीय प्रोफेशनल भी होते हैं और उन्हें प्रशिक्षण भी मिलता है।
पत्रकारिता को भी वकालत या डॉक्टरी की तरह देख रहे हैं।
लोकतंत्र का चौथा खम्भा होने का फर्जी नारा क्यों ? कोई बिना आधार के लोकतंत्र का खम्भा कैसे हो सकता है ?
प्रेस काउंसिल की जो चिन्ता है उसके पीछे इन मीडिया हाउस का सही सोच साफ-साफ देखा जा सकता है।
लेखक- स्वतंत्र पत्रकार आचार्य श्रीकान्त
इलाहाबाद,उ०प्र०
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