कवरेज इण्डिया विशेष: "पीएम इन वेटिंग" के बाद अब क्या "प्रेसिडेंट इन वेटिंग" बनकर रह जाएंगे आडवाणी?




मनोज कुमार शर्मा।

पूर्व उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी लम्बे समय तक देश के प्रधानमंत्री बनने का ख्वाब देखते रहे लेकिन उनका ये ख्वाब कभी पूरा नहीं हो सका।


पहले(2009) में कांग्रेस के हाथों पार्टी की हार ने उनके ख्वाब को तोड़ा, तो बाद में(2014) उनके शिष्य नरेन्द्र मोदी ही उनके लिए डरावना ख्वाब साबित हुए। इस प्रकार उनका प्रधानमंत्री बनने का ख्वाब, ख्वाब ही बनकर रह गया।
प्रधानमंत्री इन वेटिंग के नाम से तो उनपर जुमले तक बनने लगे। खैर जैसे-तैसे उन्होंने अपने मन को संभाल लिया कि इस जन्म में प्रधानमंत्री बनना मुश्किल ही नहीं बल्कि नामुमकिन होगा।



लेकिन फिर 2017 में आडवाणी ने देश का राष्ट्रपति बनने का सपना संजोया। लेकिन आडवाणी के ख्वाब ना हुए बीरबल की खिंचड़ी हो गई जो कभी पकती ही नहीं।
इस वर्ष देश को नया राष्ट्रपति मिलने वाला है। इस रेस में लालकृष्ण आडवाणी का नाम सबसे आगे चल रहा था। लग रहा था कि बीजेपी के पितामह इस बार अपना ख्वाब पूरा कर ही लेंगे।
लेकिन, बुधवार को सुप्रीम कोर्ट ने आडवाणी को जोर का झटका देते हुए उनके ऊपर बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले में आपराधिक मुकदमा चलाने का निर्देश दिया।


अब लगता है कि उनका प्रेसिडेंट बनने वाला दूसरा ख्वाब भी ख्वाब ही बनकर रह जाएगा। क्यूंकि राष्ट्रपति बनने के लिए पहली शर्त ही ये है कि इस पद का उम्मीदवार स्वच्छ छवि वाला होना चाहिए। उस पर किसी प्रकार का दाग नहीं होना चाहिए।
अब जब तक कोर्ट में सुनवाई जारी रहेगी तब तक बीजेपी आडवाणी का नाम आगे कर कोई राजनीतिक नुकसान नहीं झेलना चाहेगी। इसलिए कहा जा सकता है कि लम्बे समय तक पीएम इन वेटिंग रहे आडवाणी प्रेसिडेंट इन वेटिंग बनकर ही न रह जाएं।

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